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एक तरफ बेटी चिलया करेगी और दूसरी तरफ माँ

एक तरफ बेटी चिलया करेगी और दूसरी तरफ माँ

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दोस्तो, मेरे एक मित्र हैंं, श्रीमान दुर्गेश। दुर्गेश के माता पिता का स्वर्गवास कई साल पहले हो चुका था। दुर्गेश अपने दम पर ही पढ़ लिख कर इस काबिल बना के आज वो एक सरकारी दफ्तर में अच्छे ओहदे पर नौकरी कर रहा हैं। मेरे साथ दुर्गेश का बचपन से ही याराना हैं, हम दोनों ने अपनी 13 साल कि दोस्ती में हर काम एक साथ ही किया हैं। दुर्गेश का ज़्यादा समय हमारे घर में ही बीता हैं इसलिए वो मेरे मम्मी पापा को ही मम्मी पापा कहता हैं और हमारे घर से ही उसको घर परिवार का पूरा प्यार और सम्मान मिला हैं। जब उसकि सरकारी नौकरी लग गई तो उसकि शादी कि बात भी चली। दुर्गेश कि एक बुआ ही उसकि रिश्तेदारी में थी, उसने ही एक बहुत सुंदर लड़कि का रिश्ता ढूंढा, सिर्फ माँ और बेटी थी, उस घर में। दुर्गेश को भी लड़कि पसंद आ गई, जब दोनों तरफ से सेटिंग हो गई, तो दुर्गेश कि शादी भी हो गई। बहुत ही सादे से ढंग से शादी हुई क्योंकि लड़कि के पिता न होने कि वजह से से लड़कि ने अपनी कमाई में ही शादी कि थी। शादी को अभी 6 महीने ही हुये थे कि एक दिन दुर्गेश मेरे पास आया और बोला- यार तुझसे एक बात करनी थी। मैने कहा- तुझे कब से पूछ कर बात करने कि आदत पड़ गई, चल पूछ, क्या बात हैं? वो बोला- यार कुछ दिन हुये तन्वी बोली, क्यों न हम मम्मी को अपने पास बुला लें। मैने कहा- तो दिक्कत क्या हैं, बुला ले। वो बोला- अरे यार, ये कुछ दिनों कि बात नहीं हैं, वो हमेशा के लिए बुलाना चाहती हैं। मैने कहा- यार, यह तो प्रोब्लम हैं, हमेशा के लिए तो मुश्किल हो जाएगी। दुर्गेश बोला- यार तुझे तो पता हैं, अभी नई नई शादी हैं, हम तो साला कपड़े ही नहीं पहनते घर में, अगर बुड्डी आ गई तो हमारी तो शादीशुदा ज़िंदगी पर सेंसर बोर्ड बैठ जाएगा, साला सारा मजा ही चला जाएगा. वो थोड़ा चिढ़ कर बोला। मैने कहा- तो यार, इस बारे में तू तन्वी से बात कर, उसे समझा। दुर्गेश बोला- अरे बहुत समझा लिया, अकेली होने कि वजह से इसकि भी अपनी माँ से बहुत अटेचमेंट हैं, तन्वी भी कह रही हैं कि माँ तो दूसरे कमरे में रहेगी। मगर दिक्कत यह हैं कि जब हम प्रोग्राम शुरू करते हैंं तो तन्वी कि आदत हैं, वो शोर बहुत मचाती हैं। अब रोज़ रोज़ ये सब मेरी सास भी सुनेगी। क्या अच्छा लगता हैं? मैने हंस कर कहा- तो अपनी सास को पूछ लेना किसी दिन, तेरी शादी पे देखी थी, सास तो तेरी अभी भी माल हैं। दुर्गेश मेरी बात सुन कर मुस्कुरा पड़ा और बोला- भोंसड़ी के, तू अपना लण्ड पहले अकड़ा लिया कर। इधर मेरा काम बिगड़ रहा हैं और तुझे मेरी सास के खंडहर में भी बहार दिख रही हैं। मैने कहा- अरे मुझे तो दिख रही हैं, साले तू भी देख ले। हो सकता हैं, किसी दिन तेरी सास तेरी कमीनी हरकत देख कर खुद ही वापिस चली जाए। दुर्गेश बोला- और अगर नहीं गई तो? मैने कहा- अगर नहीं गई, तो हो सकता हैं, तेरे नीचे आ जाए! कह कर मै हंस पड़ा। मगर दुर्गेश कुछ चिड़चिड़ा सा होकर उठ कर चला गया, बात आई गई हो गई। अगले हफ्ते दुर्गेश कि सासु माँ अपना बोरिया बिस्तर उठा कर उसके घर आ गई। हमारी लाईफ आम दिनों कि तरह ही चलने लगी। कभी कभी जब मै दुर्गेश के घर जाता, तो मुझे लगता कि दुर्गेश कि सास का देखने का तरीका कुछ अलग सा हैं। पहले वो जिस तरह देखती थी, अब वो उस तरह नहीं देखती। मुझे एक बार लगा कि शायद आंटी लाईन दे रही हैं। अब रोज़ रात को अपने दामाद के द्वारा निकाली गई अपनी बेटी कि चीखें सुनती होगी, तो सोचती तो होगी कि दामाद जी अच्छे से अपना काम कर रहे हैंं, कोई ऐसा अच्छा सा मुझे भी मिल जाए। मै भी जब भी दुर्गेश के घर जाता, उसकि सास के साथ बहुत बातें करता… मेरा पूरा मूड था कि अगर ये ढलता हुआ हुस्न मान जाए तो अपनी शादी से पहले पहले तजुर्बेकार औरत कि भी ले कर देख लूँ। मगर सीमा आंटी मेरे से बात तो खूब खुल कर हंस बोल कर करती, मगर गाड़ी लाईन पर नहीं आ रही थी। करीब 2 महीने बाद एक दुर्गेश मेरे पास आया, मुझे वो बहुत परेशान सा लगा। मैने उसे पूछा, तो बोला- अरे यार, बड़ी मुसीबत में हूँ, क्या बताऊँ, बताता हूँ तो मुसीबत न बताऊँ तो मुसीबत। मैने कहा- अरे यार हम तो बचपन के दोस्त हैंं, बोल क्या दिक्कत हैं, जो भी प्रॉबलम होगी, हम मिल के सुलझा लेंगे। वो बोला- जिस बात का डर था, वही हो गई हैं। मैने फिर पूछा- क्या हो गया? वो बोला- अरे यार, सासु माँ कि वजह से मै मुसीबत में घिर गया हूँ। मै कुछ कुछ समझ तो गया, मगर फिर भी पूछा- क्या कर दिया तेरी सास ने? वो बोला- अरे यार उनके आने से पहले जो समस्या हमने डिस्कस कि थी, वही हो गई। “मतलब?” मैने पूछा- क्या तेरी सास भी तेरे पे फिदा हो गई? मैने बात मजाक में कही, मगर दुर्गेश ने बड़े गंभीर लहजे में सर झुका कर कहा- हाँ। फिर थोड़ा रुक कर बोला- अब तो वो अपने नाहक प्रदर्शन से भी बाज़ नहीं आती, कभी अपनी टाँगें दिखाएगी, कभी जान बूझ कर क्लीवेज दिखाती हैं। उसकि आँखें और बोलने का लहजा ऐसा हो गया कि बस मेरे एक बार कहने कि देरी हैं, अगले पल वो मेरे बिस्तर पर होगी। मैने कहा- वाह बेटा तेरे तो मज़े हैंं फिर। सोचता क्या हैं, ठोक दे साली बुड्ढी को। मगर दुर्गेश बोला- अरे नहीं यार, कल को अगर तन्वी को पता चल गया, तो मेरा तो बसा बसाया घर उजड़ जाएगा। मैने पूछा- तो तूने तन्वी को अभी तक बताया क्यों नहीं, तेरी बीवी हैं, उसे खुल कर बोल, उस पर विश्वास कर, और इस समस्या का सही हल तो वही निकाल सकती हैं। दुर्गेश ने पूछा- कौन सा सही हल। मैने कहा- देख, दो बातें हैंं, पहली कि तेरी सास को वापिस जाना होगा। तन्वी खुद अपनी माँ को वापिस भेजे अगर उसे अपनी गृहस्थी बचानी हैं, या अपनी माँ को रोके, उसे समझाये कि तुम उसके दामाद हो, उसके बेटे जैसे। पर अगर वो अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आती और वापिस नहीं जाती तो फिर तेरे लिए समस्या हैं। अगर तेरी जगह मै होता, तो सच कहता हूँ, तेरी सास जैसी मेरी सास होती, मै तो खड़का देता आंटी को। पर तू कुछ और तरह सोचता हैं। या फिर एक काम और कर! दुर्गेश ने पूछा- क्या? मैने कहा- अपनी सास से मेरी सेटिंग करवा दे, सारी गर्मी निकाल दूँगा साली कि। दुर्गेश हंस पड़ा- तू साले अपनी सेटिंग का ही सोचा कर। कमीना कहीं का। मैने कहा- देख हंसी मजाक अलग बात हैं, तू तन्वी से बात कर, और खुल कर बोल कि तेरी माँ हम दोनों के बीच आने कि कोशिश कर रही हैं, या तो उसे रोक ले, या वापिस भेज दे, अगर यहाँ रही तो ये न हो कल को तेरी माँ तेरी ही सौत बन जाए। मैने बहुत समझा बुझा कर दुर्गेश को भेजा मगर उसकि कोई भी तरकिब काम न आई। सबसे बड़ी बात, तन्वी को इस बात से कोई खास ऐतराज नहीं था कि उसकि माँ उसके पति पर डोरे डाल रही हैं। 2 दिन बाद दुर्गेश फिर मेरे पास आया। मैने उसे कहा- देख बेटा, अगर तन्वी भी इस बात कि गंभीरता को नहीं समझ रही हैं, तो चढ़ जा सूली पर, पकड़ ले अपनी सास को। उसके एक हफ्ते बाद शाम को मै और दुर्गेश बैठे पेग लगा रहे थे, दुर्गेश बोला- यार, मेरी तो सारी स्किम फेल हो गई, न तन्वी समझ रही हैं और आंटी ने तीन नई साड़ियाँ ली हैंं। अगर तू उसके ब्लाउज़ देखे तो कहे कि ये ब्लाउज़ इस आंटी ने पहनने हैंं, या हेलेन ने। इतने गहरे गले, इतनी गहरी पीठ, जैसे साली ने नंगेज दिखाने का ठेका ले रखा हो। मैने कहा- उफ़्फ़… क्या बात हैं यार! देख मेरी बात मान ले, अब आंटी का पूरा मूड हैं, या तो तू उसे चोद दे या मुझे सेवा का मौका दे। तू ऐसा कर किसी दिन पेग का प्रोग्राम अपने घर पे रख। दारू के नशे में तू बढ़िया को पकड़ ले, दोनों भाई मिल के चोदा चोदी कर देंगे आंटी कि। दुर्गेश ने पहले तो कुछ सोचा, फिर बोला- लगता हैं ऐसा ही कुछ करना पड़ेगा। उसके बाद बात आई गई हो गई। हफ्ते दस दिन बाद दुर्गेश ने मुझे अपने घर पे बुलाया, बोला- मौसम अच्छा हैं, बरसात हो रही हैं, घर आ जा, पेग लगायेंगे। मै भी तैयारी करके चला गया। अपनी शेव कि, लण्ड और आँड कि भी अच्छी से शेव कि। मुझे पता था कि आज हो न हो, उस सेक्सी आंटी कि बूर चोदने का मौका मिलने वाला हैं। शाम को 7 बजे मै उसके घर पहुंचा। घर में भाभी मिली, उनसे नमस्ते हुई, फिर भाभी कि माँ भी आई, सफ़ेद साड़ी में से भी मैने उस आंटी का बड़ा सा क्लीवेज देख लिया। आंटी ने भी जान लिया कि मेरी नज़र कहाँ हैं मगर वो भी मुस्कुरा कर चली गई कि देख ले बेटा, अगर खाने कि इच्छा हो तो बताना। मै जाती हुई कि मोटी गांड मटकती हुई देखने लगा तो दुर्गेश बोला- चल आ जा अब! और वो मुझे खींच कर ले गया। मैने दुर्गेश से कहा- देख बात सुन, तू चाहे कुछ करे न करे, पर आज अगर मुझे मौका मिला गया, तो मै इसको नहीं छोड़ने वाला। आज पक्का ये आंटी मुझसे चुदेगी। खैर हम दोनों दोस्त बैठ कर पेग लगाने लगे, खाना पीना चलता रहा, इस दौरान कई बार दुर्गेश कि सास हमारे आस पास से निकली, मगर हर बार मैने और भी गंदी नज़र से उसे देखा। हालांकि भाभी भी कई बार आई, मगर मैने उसे देखा तक नहीं, मेरा पूरा ध्यान दुर्गेश कि सास पर ही था। दारू का दौर खत्म हुआ तो खाना परोसा गया। खाने परोसा ही था कि लाइट चली गई, बाहर बहुत ज़ोर कि बारिश आ रही थी। हम मोमबत्ती कि रोशनी में खाना खाने लगे। मैने सोचा, क्यों न पंगा ले कर देखा जाए, क्योंकि मै नोटिस कर रहा था कि दुर्गेश कि सास हमारी बातों में बहुत इन्टरेस्ट ले रही थी, बड़ा हंस हंस का हम से बात कर रही थी। कई बार उसने अपना आँचल ठीक किया, दिखाया कुछ नहीं पर जब भी वो अपना आँचल ठीक करती मेरी नज़र तो खास करके उसके मम्मों पर जाती, और ये बात उसने भी ताड़ ली थी कि जमाई राज तो नहीं पर जमाई का दोस्त बहुत ध्यान से देख रहा हैं। हम सब डाइनिंग टेबल पर बैठे थे, खाना खाते खाते मैने जानबूझ कर अपना पाँव आगे बढ़ाया और मेरे सामने बैठी दुर्गेश कि सास के पाँव को छू दिया। वो एकदम से चौंक गई, मेरी तरफ देखा, मुझ पर तो पहले से ही शराब का नशा तारी था, मैने बड़े हल्के से उसको नमस्ते बुला दी। उसने जैसे एकदम से अपने सभी अरमानों को अपने में समेट लिया, चेहरे पर आई अपनी खुशी को दबा लिया। मगर अपनी आँखों कि चमक फिर भी नहीं दबा पाई। पहले सिर्फ पाँव को छुआ था, मगर जब उसने भी अपना पाँव पीछे नहीं किया, तो मैने अपने पाँव से उसका पाँव सहलाना शुरू कर दिया। पाँव से एड़ी तक और फिर एड़ी से ऊपर भी भी सहला दिया। मेरा अपना पाँव नहीं जा पा रहा था, वरना उसके घुटने तक मै सहला देता। मेरा पाँव से छूना उसको शायद अच्छा लगा, उसने अपने दोनों पाँव आगे कर दिये, मैने बारी बारी से उसके दोनों पाँव को अपने पाँव सहलाना चालू रखा। आंटी भी पूरी मस्त हुई बैठी थी और टेबल के नीचे होने वाली इस रोमांटिक कारगुजारी का मजा ले रही थी। खाना खत्म हुआ, दोनों औरतों ने बर्तन उठाए और किचन में रखने लगी। मैने मौका देख कर दुर्गेश से कहा- दुर्गेश, आज रात को तू अपनी बीवी को अपने पास सुलाना और अच्छे से बजाना उसकि। मै तेरी सास को पकड़ने वाला हूँ। वो बोला- अरे यार तू मेरे जूते मत पड़वा देना! मैने कहा- डर मत, आंटी से सेटिंग हो चुकि हैं, खाना खाते वक़्त सारा समय मै उसके पाँव सहलाता रहा हूँ, अगर उसे बुरा लगता तो वो मुझे रोक देती, मगर साली ने दूसरा पाँव भी आगे बढ़ा दिया। मौसम भी रंगीन हैं, तू तन्वी को पकड़, उसकि माँ को मै देख लूँगा। खाने के बाद हमने आइस क्रीम खाई, लाइट अभी भी नहीं आई थी न ही बारिश रुकि थी। जब रात के 12 बज गए और सोने का इंतजाम करना शुरू हुआ, तो मैने कह दिया- मै तो बाहर ड्राइंग रूम में दीवान पर ही सो जाऊंगा, आप सब अपने अपने कमरे में सो जाओ। तो दुर्गेश अपनी पत्नी को चुपके से इशारा करके अपने कमरे में ले गया, उसकि सास दूसरे कमरे में सोने चली गई। मुझे अभी नींद नहीं आ रही थी, तो मै ड्राइंग रूम कि बड़ी खिड़कि के पास खड़ा हो कर सिगरेट पीने लगा, और बाहर बरसात देखने लगा। मगर मेरा सारा ध्यान दुर्गेश कि सास पर ही था, उसके रूम में मोम बत्ती जल रही थी और दरवाजा आधा खुला था। मुझे लग रहा था जैसे आधा खुला दरवाजा एक निमंत्रण था कि अगर चाहो तो आ जाओ। एक एक करके मैने तीन सिगरेट पी डाली। थोड़ी देर बाद मुझे दुर्गेश के कमरे से सिसकारियों कि आवाज़ें आने लगी, मतलब दुर्गेश ने अपना जुगाड़ फिट कर लिया था, और तन्वी उसके नीचे लेटी सिसक रही थी। उसकि सेक्सी आवाज़ सुन कर मेरा तो लण्ड खड़ा होने लगा। मेरा दिल बहुत कर रहा था कि मै जा कर दुर्गेश कि सास के साथ लेट जाऊँ। वहीं खड़े खड़े मैने अपनी बनियान और चड्डी भी उतार दी और अपना लण्ड हाथ में पकड़ कर हिलाने लगा। 1 मिनट में ही मेरा लण्ड किसी आज्ञाकारी बच्चे कि तरह खड़ा हो गया। मै सोच रहा था, इधर मै बूर के लिए तड़प रहा हूँ, उधर एक और औरत लण्ड के लिए प्यासी हैं, और एक मर्द और औरत अपनी कामुकता को शांत कर रहे हैंं, तो दूसरे जोड़े को भी अपनी कामुकता शांत करनी चाहिए। अभी मै सोच ही रहा था, तभी पीछे से आवाज़ आई- नींद नहीं आ रही हैं क्या? एक बार तो मै काँप गया, क्योंके उस वक़्त मै तो बिल्कुल नंगा था। पीछे मुड़ कर देखा, दुर्गेश कि सास खड़ी थी, उसने नाईटी पहन रखी थी। मैने सोचा कि अगर मै इतनी धीमी से रोशनी में उसको देख पा रहा हूँ, तो वो भी तो मुझको देख सकती होगी। मै बिना कोई शर्म या परवाह किए उसकि तरफ घूम गया और बोला- सोने तो लगा था, मगर दुर्गेश के कमरे से आने वाली आवाज़ों ने सोने नहीं दिया, अब तो नींद आने का मतलब ही नहीं। मै ये देखना चाहता था कि ये औरत मेरी बात का क्या जवाब देती हैं ताकि मै उस से आगे बात बढ़ा सकूँ। उसने मुझे अंधेरे में ही अपनी नज़रों से टटोलने कि कोशिश कि। मुझे उसके हाव भाव से लगा जैसे वो ये देख रही हो कि मैने कपड़े पहने हैंं या नहीं, जबकि मेरे मन में या विचार आ रहा था कि मै आगे बढ़ूँ और इसको अपनी बांहों में भर लूँ, और जब मेरा तना हुआ लण्ड इसके पेट पे लगेगा, तो इसको खुद ब खुद पता चल जाएगा कि मै इस वक़्त बिल्कुल नंगा खड़ा हूँ। तभी बाहर बिजली चमकि, बिजली कि रोशनी ने एक सेकंड में ही आंटी के आगे सारे तस्वीर साफ कर दी। वो जैसे चौंक गई- आप… आप तो! आवाज़ जैसे उसके हलक में ही फंस कर रह गई। मै जान गया कि आंटी ने मुझे नंगा देख लिया हैं, मैने कहा- वो गर्मी सी लग रही थी न, और मुझे ये भी कोई अंदाज़ा नहीं था कि तुम आ जाओगी. मैने जान बूझ कर उसे आप कि जगह तुम कहा। मैने दिमाग में सोचा कि अब तो इसको पता चल गया हैं कि मै बिल्कुल नंगा हूँ, पर ये अब भी यहीं खड़ी हैं, जा नहीं रही हैं, मतलब शैतानी तो इसके दिमाग में भी हैं। मैने अपना गला साफ करके फिर बात आगे बढ़ाई- और वैसे भी अभी मेरी शादी भी नहीं हुई हैं, अब देखो दुर्गेश और तन्वी कैसे मज़े ले रहे हैंं। मेरे पास तो कोई भी नहीं, जिस से मै मज़े ले सकूँ, उसको मज़े दे सकूँ। पत्ता तो मैने फेंक दिया था, अब देखना ये था कि आंटी उठाती हैं क्या। वो चुप रही. मैने फिर दूसरी बात शुरू कि- और वैसे भी तन्वी भाभी कि सिसकारियाँ, कराहटें सुन सुन कर तो अब मेरा मन ऐसा हो रहा हैं कि मेरा मन कर रहा हैं कि मै किसी को भी पकड़ लूँ और अपने मन कि कर लूँ। रंग,रूप, उम्र मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, बस औरत होनी चाहिए। मेरी बात सुन कर वो पीछे मुड़ी और चली गई। मैने देखा कि वो अपने कमरे में चली गई, मगर उसने दरवाजा बंद नहीं किया। मै बहुत उलझन में था, क्या करूँ, उसके पीछे उसके कमरे में जाऊँ या रहने दूँ। बहुत सोच कर मै आगे बढ़ा और उसके कमरे के दरवाजे तक गया, अंदर मोमबत्ती कि हल्कि सी रोशनी थी। मैने देखा कि आंटी बेड पे चादर ओढ़ कर लेटी थी। मै उसके पास जा कर खड़ा हो गया। अब मोमबत्ती कि रोशनी में वो मेरा नंगा जिस्म ठीक से देख सकती थी। उसकि निगाह और मेरी निगाह आपस में उलझी थी. तभी मैने देखा बेड कि एक किनारे पर आंटी कि नाईटी पड़ी थी, मतलब आंटी तो चादर में नंगी हैं। मैने अपना लण्ड अपने हाथ में पकड़ा और उसे हिलाते हुये आंटी के साथ ही बेड पे लेट गया। मेरे लेटते ही आंटी मुझसे लिपट गई, मैने भी उसे अपनी बाहों में भर लिया, और बाहों में भरते ही अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिये। मै खुद को गर्म समझ रहा था, मगर आंटी भी कम गर्म नहीं थी, मुझसे ज़्यादा उसने मेरे होंठ चूसे, तेज़ गर्म साँसें उसकि मेरे चेहरे पे गिर रही थी। मैने उसकि चादर उतार कर बेड से नीचे ही फेंक दी, और अपने एक हाथ से मम्मे पकड़ कर दबाये। उसको सीधा करके लेटाया और खुद उसके ऊपर लेट गया, आंटी ने अपनी टाँगें खोली, और मेरी कमर के गिर्द लिपटा ली। मैने उस से कहा- बहुत ललचा रही थी अपने दामाद को देख कर, आ आज अपने दामाद के यार से मिल। मै करूंगा तेरी बूर ठंडी। उसने मुझे और ज़ोर से अपनी बाहों में कस लिया। अब ज़्यादा देर करने कि कोई ज़रूरत तो थी नहीं, मैने अपना लण्ड पकड़ा आंटी कि बूर पर रखा और अंदर धकेल दिया। एक बार में ज़ोर लगा कर मैने अपने सारा लण्ड उसकि बूर में घुसा दिया। आंटी के मुंह से एक ठंडी सांस निकली, एक सांस संतुष्टि कि। “पेल, दबा के पेल!” वो बोली। मैने कहा- बहुत तड़प रही हो चुदवाने को? वो बोली- बात मत कर, काम कर, अब जब तक मै न कहूँ, गिरना नहीं चाहिए। मै लगा पेलने, पहले नीचे लेटा कर पेला, फिर घोड़ी बना कर पेला, फिर अपने ऊपर बैठा कर पेला, फिर खड़ी करके, फिर दीवार सटा कर पेला। हर बार मै आसान बदलता और पूरे ज़ोर से आंटी कि ठुकाई कि। आंटी काँप रही थी, दो बार आंटी का पानी छूटा, दोनों बार झड़ते वक़्त आंटी रो पड़ी। मैने पूछा- क्या हुआ, दर्द हुआ जो रोती हो? वो बोली- नहीं रे पगले… आनन्द ही इतना बढ़ गया कि खुशी के मारे रो पड़ी। मैने कहा- अगर तुम्हारे रोना तुम्हारे बेटी और दामाद ने सुन लिया तो? वो बोली- जब मै अपनी बेटी कि चीखें हर रात सुनती हूँ, तो क्या एक दिन वो मेरी चीखें नहीं सुन सकती। मै आंटी कि बहादुरी पर बड़ा खुश हुआ। पिछले आधे घंटे से मै आंटी को चोद रहा था, अब मुझे भी सांस चढ़ने लगी थी। आंटी बोली- अगर थकने लगा हैं तो गिरा दे माल! बाकि काम बाद में कर लेना। मैने भी ज़ोर ज़ोर से घस्से मारे और आंटी कि बूर को अपने वीर्य से भर दिया। आंटी ने खुश होकर मेरे होंटों को चूम लिया- मजा आ गया पट्ठे, दम हैं तेरे अंदर! अब आराम कर, सुबह से पहले एक बार और आना। और आंटी मुझसे लिपट गई, थोड़ी देर में हम दोनों सो गए। सुबह करीब 3 बजे आंटी ने मुझे जगाया- उठो, अरे उठो। मैने उठ कर पूछा- क्या हुआ? वो बोली- सुबह होने वाली हैं, इससे पहले एक झट और लगा लेते हैंं। लाईट आ चुकि थी, इस बार हमने रूम कि दोनों बत्तियाँ जगा ली, पूरी रोशनी में मैने आंटी को खूब तसल्ली से चोदा, इस बार हमारा चोदन करीब एक घंटा चला। जो बूटी मै खाकर आया था, उसने अपना पूरा असर दिखाया। 4 बजे के बाद मैने अपने माल से आंटी कि बूर फिर से भर दी, सारे मम्मे अपने दाँतों से काट काट कर निशानों से भर दिये। चुदाई के बाद मै वहीं सो गया। सुबह करीब 8 बजे तन्वी ने मुझे जगाया और चाय दी, मैने देखा, आंटी वहाँ नहीं थी, वो बाथरूम में थी। अब चादर के अंदर तो मै नंगा ही था, तन्वी बोली- आप अंदर कब आए? मैने झूठ ही कह दिया- अरे भाभी, रात मै लेट तो गया बाहर… मगर बाद में मुझे ठंड लगी, सो मै उठ कर अंदर आ कर सो गया। रात लगता हैं ज़्यादा ही पी गया, तो पता ही नहीं चला के कहाँ पड़ा हूँ। मै बेशक तन्वी भाभी से आँखें चुरा रहा था, मगर उसके चेहरे कि मुस्कान और आँखों कि चमक ने जैसे कह दिया हो- भैया, हमको बूरिया बनाते हो। रात क्या क्या हुआ, हमें सब पता हैं। थोड़ी देर बाद दुर्गेश आया, उसने पास आकर बैठ कर मुझसे पूछा- साले रात बड़ी चीखें निकलवाई मम्मी जी कि? मैने कहा- अरे यार पूछ, मत कितनी आग हैं तेरी सास में, साली का दिल ही नहीं भरता। बहुत प्यासी हैं लण्ड कि। वो बोला- तभी तुझे ये ड्यूटी दी थी तन्वी ने! “तन्वी ने?” मैने हैंरान हो कर पूछा। दुर्गेश बोला- हाँ, तन्वी ने ही मम्मी जी के चोदन के लिए तुझे चुना था। इन माँ बेटी कि आपस में पूरी सेटिंग हैं। मैने इस काम के लिए मना किया तो तन्वी ने तुझे चुना था। अब तूने अपना काम बढ़िया से कर दिया तो अब तो जब मर्ज़ी आ और लग जा। एक तरफ बेटी चीखा करेगी और दूसरी तरफ माँ।

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